श्याम भक्तों और शेखावाटी के लोगों के साथ यह कैसा मज़ाक..!!
रींगस-खाटू रेल परियोजना पर फिर टूटी उम्मीदें: क्या श्याम भक्तों को मिला सिर्फ़ एक और ‘लॉलीपॉप’...?
मेरी कलम से. ( बी एल सरोज ) :- रींगस.पिछले एक दशक से लाखों श्याम भक्तों और शेखावाटी के लोगों को रींगस से खाटूश्यामजी होते हुए डीडवाना-नागौर तक रेल लाइन का सपना दिखाया जाता रहा। सर्वे हुए, भूमि अधिग्रहण की प्रक्रियाएं शुरू हुईं, नोटिस जारी हुए, बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन आज तक यह परियोजना कागजों से बाहर नहीं निकल सकी।
अब सरकार ने सुंदरपुरा रेलवे स्टेशन को “खाटूश्यामजी सुंदरपुरा” के नाम से विकसित करने की घोषणा कर नई बहस छेड़ दी है। क्षेत्र के लोगों और श्याम भक्तों का कहना है कि वर्षों से सीधी रेल कनेक्टिविटी की मांग करने वालों को यह घोषणा एक तरह का “लॉलीपॉप” थमाने जैसी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देशभर से आने वाले अधिकांश श्रद्धालुओं की आस्था और यात्रा का केंद्र रींगस जंक्शन है, तो सुंदरपुरा को प्राथमिकता क्यों दी गई? हजारों श्रद्धालु रींगस और खाटू मोड़ से निशान यात्रा शुरू कर बाबा के दरबार तक पहुंचते हैं। यही मार्ग वर्षों से उनकी धार्मिक परंपरा का हिस्सा रहा है।
हैरानी की बात यह है कि रींगस से खाटूधाम पहुंचने में जहां सड़क मार्ग से लगभग 20 से 30 मिनट का समय लगता है, वहीं सुंदरपुरा से भी खाटू पहुंचने में लगभग इतना ही समय लगता है। ऐसे में श्रद्धालुओं को वास्तविक सुविधा क्या मिलेगी, यह बड़ा सवाल है।
यदि दोनों स्थानों से खाटूधाम पहुंचने में लगभग समान समय लगना है, तो फिर सुंदरपुरा स्टेशन को खाटूश्यामजी के नाम से विकसित करने का औचित्य क्या है? क्या यह निर्णय श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखकर लिया गया है या फिर अधूरी रेल परियोजना से ध्यान भटकाने का प्रयास है?
श्याम भक्तों का कहना है कि यह फैसला सुविधा से अधिक दुविधा पैदा करता नजर आ रहा है। एक ओर वर्षों से लंबित रींगस-खाटू-डीडवाना-नागौर रेल परियोजना पर चुप्पी है, वहीं दूसरी ओर नाम बदलने और स्टेशन विकसित करने की घोषणा को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
शेखावाटी के लोग और लाखों श्याम भक्त अब सरकार से स्पष्ट जवाब चाहते हैं—क्या रींगस से खाटूधाम तक सीधी रेल लाइन का सपना हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? यदि नहीं, तो इसकी समयसीमा क्या है?
आस्था के केंद्र खाटूधाम को प्रतीकात्मक घोषणाओं की नहीं, बल्कि वास्तविक रेल कनेक्टिविटी की जरूरत है। श्रद्धालुओं को अब नाम बदलने की राजनीति नहीं, बल्कि पटरियों पर दौड़ती ट्रेन चाहिए।
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